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गांधीजी ने कर्मयोगी गुरुचांद ठाकुर को लिखि चिट्ठी

पूर्वी बंगाल के बोरिशाल जिले में चित्तरंजन दास की देखरेख में एक विशाल सभा का आयोजन किया। उस सभा में गांधीजी भी उपस्थित थे। इतना प्रचार-प्रसार होने के बाद भी सभा में बहुत कम लोग उपस्थित थे। गांधीजी ने चित्तरंजन दास से इसका कारण जानना चाहा तो चित्तरंजन दास ने गांधीजी से कहा, इस क्षेत्र में अधिकतर अविकसित समाज के लोग रहते हैं। इस क्षेत्र पर कर्मयोगी गुरुचांद ठाकुर का प्रभाव है। इस क्षेत्र में कर्मयोगी गुरुचांद ठाकुर की सहमति के बिना कोई भी आंदोलन सफल नहीं हो सकता। गांधीजी ने चित्तरंजन के मार्फत कर्मयोगी गुरुचांद ठाकुर को चिट्ठी लिखकर विनती की एवं विदेशी कपड़ों का निषेध करने का अनुरोध किया। इसके प्रतिउत्तर में कर्मयोगी गुरुवाद ठाकुर ने गांधीजी को लिखा, "हमारे अछूत लोगों ने कभी विदेशी काय नहीं अपनाया। हमारी मां-बहनों को अपनी लाज बचाने के लिए कपड़ा तक उपलब्ध नहीं होता। अतः हमारे लिए विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने का प्रश्न ही हमारे लिए नहीं उठता। विदेशी कपड़े तो आप लोग अपनाते हो, आप ही इसे पहनते हो, तो आप लोग ही इसका बहिष्कार करो।" आजादी के आंदोलन में सहभागी होने के विषय में उन्होंन...

हिन्दू धर्म छोड़ने का संकल्प

  हिन्दू धर्म छोड़ने का संकल्प डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने अपने भाषण में कहा- “मैंने हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज की रूढ़ियों में सुधार करने की बहुत कोशिश की। हमने स्वयं समानता का दर्जा पाने के लिए बहुत प्रयास किए। मन्दिर प्रवेश के लिए सत्याग्रह किए। लेकिन सब बेकार हुए।  13 अक्टूबर, 1935 तक डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू समाज को समतामूलक समाज बनाने के लिए भरसक प्रयास किया। किन्तु वे जान गए कि हिन्दू धर्म का मर्ज इतना बढ़ चुका है कि उसके ठीक होने के कोई लक्षण नहीं दिखाई देते।हिन्दू धर्म में 'समानता' के लिए कोई स्थान है ही नहीं। जाति-पांति का होना हिन्दू धर्म का आधार है। छोटा-बड़ा और ऊंच-नीच मानना धार्मिक और शास्त्रसम्मत सिद्धान्त है। यह सदा-सदा से व्यापक और व्यावहारिक रूढ़ि है, जिसको तोड़ा नहीं जा सकता। हम जब तक अपने आपको हिन्दू मानते रहेंगे तब तक हम अछूत ही बने रहेंगे। इसलिए हिन्दू धर्म का त्याग करने के बाद ही हमारी स्थिति में सुधार संभव होगा। धर्मान्तर के अलावा हमारे उद्धार का कोई दूसरा रास्ता नहीं है। हिन्दू धर्म रूपी बीमारी से बचने के लिए उन्होंने 13 अक्टूबर, 1935 को नाशिक शहर के पास येवल...

मनुस्मृती

 क्या ब्राह्मण स्वय मनुस्मृती नियमों का पालन करते हैं?  मनुस्मृति प्रणीत नियमों के अनुसार ब्राह्मणों को रासायनिक द्रव्य, रंगीन कपड़ा, फूल, सुगंधि द्रव्य और शस्त्र का धंधा वर्ज्य है। परंतु संप्रति ब्राह्मण कपड़ों की दुकानें, रासायनिक द्रव्यों की दुकानें, अत्तरों की दुकानें, दुग्धालय, उपाहारगृह, केशकर्तनालय इत्यादि विविध धंधे चलाते हैं। संदर्भ:- संवैधानिक भारत निर्माता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर और महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल  लेखक :- संजय गजभिए प्रकरण-2,(ग) 8. महाड़ सत्याग्रह-'मनुस्मृति दहन' पृष्ठ सं.116

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  बसपा सरकार ने उत्तर प्रदेश के विकास के लिए किये गये योगदान (2007-2012)