गांधीजी ने कर्मयोगी गुरुचांद ठाकुर को लिखि चिट्ठी

पूर्वी बंगाल के बोरिशाल जिले में चित्तरंजन दास की देखरेख में एक विशाल सभा का आयोजन किया। उस सभा में गांधीजी भी उपस्थित थे। इतना प्रचार-प्रसार होने के बाद भी सभा में बहुत कम लोग उपस्थित थे। गांधीजी ने चित्तरंजन दास से इसका कारण जानना चाहा तो चित्तरंजन दास ने गांधीजी से कहा, इस क्षेत्र में अधिकतर अविकसित समाज के लोग रहते हैं। इस क्षेत्र पर कर्मयोगी गुरुचांद ठाकुर का प्रभाव है। इस क्षेत्र में कर्मयोगी गुरुचांद ठाकुर की सहमति के बिना कोई भी आंदोलन सफल नहीं हो सकता। गांधीजी ने चित्तरंजन के मार्फत कर्मयोगी गुरुचांद ठाकुर को चिट्ठी लिखकर विनती की एवं विदेशी कपड़ों का निषेध करने का अनुरोध किया। इसके प्रतिउत्तर में कर्मयोगी गुरुवाद ठाकुर ने गांधीजी को लिखा, "हमारे अछूत लोगों ने कभी विदेशी काय नहीं अपनाया। हमारी मां-बहनों को अपनी लाज बचाने के लिए कपड़ा तक उपलब्ध नहीं होता। अतः हमारे लिए विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने का प्रश्न ही हमारे लिए नहीं उठता। विदेशी कपड़े तो आप लोग अपनाते हो, आप ही इसे पहनते हो, तो आप लोग ही इसका बहिष्कार करो।" आजादी के आंदोलन में सहभागी होने के विषय में उन्होंने कहा क्या आप लोग अछूतों को अपना भाई समझते हो? यदि आप अछूतों के साथ मानवता को सहयोग करो तो हम तुम्हारे आंदोलन में शामिल होंगे। भारत में ब्रिटिशों के आने से अटूतों को जो मान-सम्मान एवं अधिकार मिला है, ब्रिटिशों के चले जाने के बाद भी वह कायम रहे इसकी आप कोई गारंटी देते हो, तो हम आजादी के आंदोलन में सहभागी होंगे।"" गांधीजी ने इस पत्र का जवाब तक नहीं दिया। 

संदर्भ:-

संवैधानिक भारत निर्माता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर और महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल 

लेखक :- संजय गजभिए

प्रकरण-3,(क) 3. कर्मयोगी गुरुचांद ठाकुर  पृष्ठ सं.174

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